Book Review: Meri Ayodhya, Mera Raghuvansh by Rajeev ‘Acharya’
Title: Meri Ayodhya, Mera Raghuvansh
Author: Rajeev ‘Acharya’
Pages: 328
Publisher: Prabhat Prakashan Pvt. Ltd.
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वह अद्भुत है, श्री राम की मानवीय लीलाओं का आनंद प्रभु राम नजरिये जो चित्रित किया है वह सटीक रूप से पाठकों को जोड़ता है। “मेरी अयोध्या, मेरा रघुवंश” एक ऐसी अद्भुत रचना है जो प्रभु श्री राम के चरित्र को प्रभु राम के ही नज़रिए से पाठकों तक पहुंचाने का अप्रतिम प्रयास करती है। जिस प्रकार रामायण की चौपाइयों के माध्यम से इस किताब को अलंकृत किया है, इस किताब को शुरुवात से ही मनोरम बना दिया है। विभिन्न रामायणों से जो अध्ययन कर राम के चरित्र को राम के ही नज़रिए से पाठकों तक पहुंचाने का अप्रतिम प्रयास।
इस किताब में जो शब्दों के मोतियों को पिरोया है वह निश्चित ही सुन्दर और सरल है। श्री राम के नजरिये से उनका जीवन देखना निश्चित ही कुछ नया है। श्री रामजन्म से लेकर उनकी तपोवन की यात्रा उनका पराक्रम उनका संयम जिस प्रकार चित्रित किया गया है वह पढने जैसा है। इस प्रकार कि रचना को पढ़ना निश्चित ही रोचक होगा। रामायण के पत्रों का चित्रण एवं दृश्यों की परिकल्पना से ऐसा लगता है जैसे कि रामचरित मानस की घटनाओं का ही चित्रण उपन्यास में किया गया है, और यही परिकल्पना उपन्यास कि एक मजबूत कड़ी के रूप में दिखती है।
राम के चरित्र पर सबके अपने अपने मत हैं अपनी अपनी राय् है। और यह राय भगवान वाल्मीकि द्वारा चित्रित किये गए चरित्र पर आधारित है जिसमे राम के चरित्र को सामाजिक दृष्टिकोण से समझना तो आसन होता है परन्तु राम के उन निर्णय एवं उन परिस्थितियों पर श्री भगवान कि व्यथा को समझ पाना एवं उस व्यथा को महसूस कर पाना सभी के लिए संभव नहीं हो पाता है परन्तु उस व्यथा को श्री राम के श्रीमुख से उनके नज़रिए लोगो को महसूस करा पाना अब तक शायद नहीं हो पाया था जो इस उपन्यास में संभव हुआ है अतः उपन्यास में श्री राम के भाव, उनकी करुना एवं उनकी सुखद और दुखद अनुभूति दर्शित हुई है, जो इस उपन्यास को सभी के ह्रदय से जोडती है एवं उपन्यास को सबसे अलग बनाती है।
उम्मीद है इस उपन्यास के द्वारा उस दूसरे पहलू को भी जो लेखक ने उजागर करने कि कोशिश की है कुछ लोगो के दृष्टिकोण को बदलने में सफल हो सकती है, जो उस भाव को व्यक्ति विशेष के स्थान पर रख कर नहीं सोच पाते। पाठकों के लिए यह हमारे सनातन संस्कृति से अवगत कराने का सटीक जरिया है यह उपन्यास।
आज कि पीड़ी को उस युग से जोड़ पाना आज एक बहुत मुश्किल काम है नयी पीड़ी को उस युग और उन घटनाओं से अवगत करने कुछ जरिये है हमारे ग्रन्थ परन्तु उन ग्रंथों को हर एक के लिए पढ़ पाना हमेशा सम्भव नहीं हो सकता है तो उस जगह पर उस संस्कृति से आज की पीड़ी को जोड़ना उन्हें उसके महत्त्व को समझाना आवश्यक भी है और कठिन भी। ऐसे में इस प्रकार के उपन्यास आज के समय में एक ज़रूरत भी हैं और एक कड़ी भी।
सामान्यतःश्री राम एवं उनके पिता दशरथ के बारे में अधिकांशतः जानते है परन्तु उसके पहले का समय इस उपन्यास में साझा किया गया है।राम जन्म के बाद उनकी अठखेलियाँ जिस प्रकार से चित्रित हैं अनुपम है श्री राम के छोटे-छोटे कदमों से चलने का वो चित्रण “ठुमक चलत राम चन्द्र ,बाजत पैजनिया” के उत्सर्ग को बताता है।
उपन्यास में अधिकांशतः वर्णन कथनों के रूप में है जो इसे अत्यधिक रोचक बनाता है। उस समय के संवाद कथानक जिस प्रकार प्रस्तुत किया गया है वह पाठकों को उपन्यास से जोड़ता चलता है और परिदृश्यों को कल्पना में बदलने में समय नहीं लगता। इसके साथ ही आसपास के वातावरण जैसी छोटी-छोटी सी कल्पनाओं को शब्दों का रूप देकर उन्हें उजागर करना एक विशेष पहलू है।
आत्म कथाएं अपने आप में सम्पूर्ण कृति होती हैं भावों से परिपूर्ण उस पर यह हमारे रघुवंश के राम की आत्मकथा है, निश्चित ही रोचक आत्मकथा जो पाठकों को शुरू से अंत तक जोड़े रखेगी और स्वयं को उस काल के अनुभव से भी जोड़ेगी। एक बार इस उपन्यास को पढ़ना एक सही चयन होगा। पाठकों कि उम्मीदों पर निश्चित कि खरा उतरेगा यह उपन्यास।
शुभकामनाये एवं आभार सहित!
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